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एसे होते हैं माता और पिता

माता और पिता ये कोई मधर्स डॅ या फाध्रस डॅ के मोहताज नहीं है। हालांकि हमने ये पाश्चात्य ‘डे’ का भी स्वीकार किया है लेकिन हमको ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारी हिन्दू संस्कृति में पूरा पखवाडा जिसे हम श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जानते है, मनाया जाता है।
तो मैं भी ईस श्राद्ध पक्ष में माता-पिता के उपर दो कवि की रचना प्रस्तुत करता हूं जो मैंने ‘सब’ चेनल के ‘वाह वाह कूया बात है’ शो में सूनी थी।  ‘वाह वाह क्या बात है’ के उस एपिसोड में जो कविताए और गीत सूनायें वो अनूठे थे। आंख में आंसू लाने वाले थे। माननीय कवि गण में से पवन दीक्षितजी की ये रचना आप की भी आंख में आंसू ला देंगे। इस के विडियो की लिंक भी मैं दे रहा हूं।

झुलम ये ढाया तूने मोहे बिसराया लल्ला एसा गया रे परदेस
कैसी ये माया तेरी, हुआ तू पराया बिटवा एसा गया रे परदेस….झुल्म ये ढाया तूने

झूठी कसम का रे फेंका तूने पासा लल्ला, फेका तूने पासा
लौट के आउंगा दे के ये दिलासा, बिटवा दे के ये दिलासा
मा अपनी का रे, सोचा ना जरा सा, मा अपनी का रे, सोचा ना जरा सा, समज ना पायी लल्ला मैं तेरा जासा
तू मेरी छाया तूने मोहे भरमाया, मेरा जिया भर आया, लल्ला एसा गया रे परदेस…झुलम ये ढाया तूने

हम को बिरह का ये पर्बत न चहिए रे, पर्बत न चहिए
तुज बिन जो इन की है हालत न कहिए रे, हालत न कहिए
दूर हो तू तो ये बरकत न चहिए, बेटा हमें ऐसी दौलत न चहिए
हमने न खाया फिर भी तुज को पढाया तू तो लौट न पाया, लल्ला एसा गया रे परदेस…झुलम ये ढाया तूने

इन की छडी इन पे ताने कसे है रे, ताने कसे
आंगन का सन्नाटा, हम को डसे है रे, हम को डसे
देख के इस घर को दुनिया हसे रे, देख के इस घर को दुनिया हसे, 
तू अनजान बिदेस बसे है, 
कब तक चलेगी रे बूढी ये काया, तूजे याद न आया, बिटवा एसा गया रे परदेस…झुलम रे ढाया तूने

मां फिर भी मा होती है….इतनी शिकायत के बाद भी मा का प्यार देखिये

फिर भी अशीष है रे तेरी महेतारी, लल्ला तेरी मेहतारी
महेके सदा लल्ला तेरी फूलवारी, लल्ला तेरी फूलवारी
बांधी है बरगत से मैंने किनारी, बांधी है बरगत से मैंने किनारी
खूब फले फूले बगियां तुम्हारी, 
सुख का हो साया, दुःख की दूर हो छाया, है तो मेरा ही जाया, तुज को खूब फले रे परदेस, तुज को खूब फले रे परदेस….

http://www.desi-tashan.com/dailymotion/801441-12th-may-2013-wah-wah-kya-baat-hai-part2/

इसी कार्यक्रम में पिता के लिए भी बहोत अच्छी रचना प्रस्तुत की गई। ऋतु गोयल की रचना सूनिए।

जो दुःखो की बारिश में छत्री बन करते है, घर के दरवाजे पर नजर बटटुबन टंगते है
समेट लेते है सब का अंधियारा भीतर, खुद आंगन में एक दीपक बन जाते हैं, ऐसे होते है पिता

बेशक पिता लोरी नहीं सुनाते, मां की तरह आंसू नहीं बहाते
पर दिन भर की थकान के बावजूद रात का पहेरा बन जाते है

और पिता जब निकलते है ना सुबह तिनको की खोज में
किसी के खिलौने किसी की किताबें, किसी की मीठाई, किसी की दवाई
परवाज पर होते है घरभर के सपने, पिता कब होते है खुद के अपने

और जब सांझ ढले लोटते है घर को, मां की चूडियां खनकती हैं, नन्हीं गुडिया चहकती है
सब के सपने साकार होते है, पिता उस समय अवतार होते है
जवान बेटियां बदनाम होने से डरती है, हर गलती पर आंखो की मख पडती है
दरअसल भय, हया, संस्कार का बोलबाला है पिता, मोहल्लेभर की जुबां का ताला है पिता

हां सच है, हां सच है, मां संवेदना है, पिता कथा
मा आंसू है, पिता व्यथा
मा प्यार है, पिता संस्कार
मा दूलार, पिता व्यवहार, 
दरअसल है पिता वो वो है जो जो मां नहीं है
मा जमीं, पिता आसमान
ये बात कितनी सही है, ये बात कितनी सही है

हां, हां, पिता वो हिमालय है जो घर की सुरक्षा के लिये सर उठा सीना तानकर तना होता है
पिता ना हो तो घर कितना अनमना होता है, पिता ना हो तो घर कितना अनमना होता है

हां पिता हो तो घऱ स्वर्ग होता है, पिता ना हो तो उनकी स्मृतियां भी फर्ज निभाती है
पिता की तो तसवीर से भी दुआएं आती है, 

http://www.desi-tashan.com/dailymotion/801636-12th-may-2013-wah-wah-kya-baat-hai-part6/

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Author:

A journalist who loves his country most than any other thing. I am ever learning man. Reading, writing , Hindi films, television, music and learning new things are my passion. I like to be innovative.

મારો બ્લોગ વાંચવા બદલ આભાર.

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